वर्क-फ्रॉम-होम और प्रदूषण का डबल अटैक- दिल्ली-एनसीआर में बढ़ रहा ‘साइलेंट लिवर क्राइसिस’।

“लिवर रोग अब केवल शराब से नहीं, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल और प्रदूषण से पैदा हो रहा एक साइलेंट किलर बन चुका है” – डॉ. अपूर्व पांडे

नोएडा।दिल्ली-एनसीआर में वर्क-फ्रॉम-होम (WFH) संस्कृति, खराब खानपान और बढ़ते वायु प्रदूषण के चलते लिवर रोग तेजी से बढ़ रहे हैं और अब यह एक ‘साइलेंट पब्लिक हेल्थ क्राइसिस’ का रूप ले चुके हैं। यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, मॉडल टाउन द्वारा आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि लिवर अब केवल शराब के कारण नहीं, बल्कि आधुनिक जीवनशैली और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से प्रभावित हो रहा है।प्रेस वार्ता में प्रमुख रूप से डॉ.अपूर्व पांडे एडिशनल डायरेक्टर एवं एचओडी – गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी और डॉ. शैलेश शर्मा एचओडी एवं सीनियर कंसल्टेंट – पीडियाट्रिक्स शामिल रहे।डॉक्टरों के अनुसार, भारत में हर 5 में से 1 व्यक्ति ‘साइलेंट लीवर डिजीज’ के खतरे की ओर बढ़ रहा है। DiaFib-Liver Study में 9,202 लोगों की स्क्रीनिंग में 5% लोगों में बिना लक्षण वाला सिरोसिस पाया गया। वहीं, MASLD के मामले 2023 के 1.3 बिलियन से बढ़कर 2050 तक 1.8 बिलियन होने का अनुमान है।दिल्ली-एनसीआर में स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां 22.8% आबादी फैटी लिवर से प्रभावित है, जबकि डायबिटीज और मोटापे वाले हाई-रिस्क ग्रुप में यह आंकड़ा 60.4% तक पहुंच जाता है। एम्स के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में फैटी लिवर के मामले ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में लगभग 40% अधिक हैं।डॉ. अपूर्व पांडे ने कहा, “PM2.5 जैसे प्रदूषक सांस के जरिए खून में मिलकर लिवर तक पहुंचते हैं और सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और फाइब्रोसिस का कारण बनते हैं। वर्क-फ्रॉम-होम के कारण कम हुई शारीरिक सक्रियता इस खतरे को और बढ़ा रही है।”उन्होंने आगे बताया कि उनके ओपीडी में आने वाले 30 से 40 प्रतिशत मरीज फैटी लिवर के होते हैं, जिनमें अधिकांश की उम्र 20 से 50 वर्ष के बीच होती है। खासतौर पर 20–30 वर्ष के युवा वयस्क और 40–60 वर्ष के लोग इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित हैं।इसके अलावा, 18–20 वर्ष के युवाओं में भी फैटी लिवर तेजी से बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण निष्क्रिय जीवनशैली, व्यायाम की कमी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट (मैदा, चीनी) का अधिक सेवन है।डॉ. अपूर्व पांडे ने ‘लीन फैटी लिवर’ पर भी चिंता जताई और बताया कि सामान्य वजन वाले 9% से 32% भारतीय भी इससे प्रभावित हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि केवल दुबला होना स्वस्थ होने की गारंटी नहीं है।डॉ. शैलेश शर्मा ने बच्चों में बढ़ते मामलों पर कहा, “दिल्ली के करीब 35% बच्चों में फैटी लिवर के लक्षण मिल रहे हैं। फास्ट फूड, स्क्रीन टाइम और शारीरिक गतिविधि की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। अब कम उम्र में भी गंभीर लिवर फेल्योर के केस सामने आ रहे हैं।” उन्होंने बताया कि हाल ही में एक 8 साल की बच्ची का प्लाज्माफेरेसिस तकनीक से सफल इलाज किया गया, जिससे ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ी।डॉक्टरों ने बताया कि अब FIB-4 स्कोर और फाइब्रोस्कैन जैसी आधुनिक तकनीकों से लिवर डैमेज की शुरुआती और सटीक पहचान संभव है। साथ ही आयुष्मान भारत और दिल्ली आरोग्य कोष जैसी सरकारी योजनाएं महंगे इलाज में मरीजों की मदद कर रही हैं।डॉक्टरों ने सलाह दी कि लोग संतुलित आहार लें, जंक फूड और मीठे पेय से बचें, नियमित व्यायाम करें, समय-समय पर जांच कराएं और बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयों का सेवन न करें।अंत में डॉक्टरों ने कहा कि लिवर रोग अब ‘साइलेंट किलर’ बन चुके हैं और समय पर पहचान व जीवनशैली में सुधार ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
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