रैगिंग मुक्त भारत के निर्माण में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका।
रैगिंग मुक्त भारत के निर्माण में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका।

हापुड़।मोनाड विश्वविद्यालय के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय की संकायाध्यक्ष एवं छात्र कल्याण अधिष्ठाता (DSW) डॉ. सोमा दास ने अपने लेख रैगिंग मुक्त भारत के निर्माण में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका में लिखा कि आज के आधुनिक युग में उच्च शिक्षण संस्थान केवल ज्ञान प्रदान करने के केंद्र नहीं हैं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण, नैतिक मूल्यों के विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना जागृत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन रैगिंग जैसी नकारात्मक प्रवृत्ति इस उद्देश्य में गंभीर बाधा उत्पन्न करती है। इसलिए रैगिंग मुक्त भारत का निर्माण केवल कानूनों के पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए सुरक्षित, संवेदनशील और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण विकसित करना भी आवश्यक है।रैगिंग: एक गंभीर सामाजिक एवं शैक्षणिक समस्या* – रैगिंग का अर्थ वरिष्ठ विद्यार्थियों द्वारा नवप्रवेशी विद्यार्थियों के साथ ऐसा व्यवहार करना है, जिससे उन्हें मानसिक, शारीरिक या भावनात्मक परेशानी का सामना करना पड़े। इसे परिचय या मनोरंजन का नाम देकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। किसी विद्यार्थी को अपमानित करना, धमकाना अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य करने के लिए बाध्य करना उसकी गरिमा और अधिकारों का उल्लंघन है। रैगिंग के कारण विद्यार्थियों में भय, तनाव, आत्मविश्वास की कमी तथा शैक्षणिक प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।रोकथाम में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिकाओं – रैगिंग मुक्त परिसर के निर्माण में विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक संस्थान को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के एंटी-रैगिंग विनियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना चाहिए। एंटी-रैगिंग समिति और एंटी-रैगिंग स्क्वॉड को सक्रिय रखते हुए शिकायतों की निष्पक्ष जाँच तथा नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। विद्यार्थियों को यह विश्वास होना चाहिए कि उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाएगा और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।इसके साथ ही, जागरूकता कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ, कार्यशालाएँ और पोस्टर अभियान आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि विद्यार्थी अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक बन सकें। वरिष्ठ विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि उनकी वास्तविक भूमिका नवप्रवेशियों को डराने की नहीं, बल्कि उनका मार्गदर्शन करने और उन्हें सहयोग प्रदान करने की है।
सहयोग, संवाद और सुरक्षित वातावरण की आवश्यकता
विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों को नए परिवेश में सामंजस्य स्थापित करने के लिए मार्गदर्शन और सहयोग की आवश्यकता होती है। मेंटरशिप प्रणाली, शिक्षक-विद्यार्थी संवाद और सकारात्मक परिचय कार्यक्रमों के माध्यम से नवप्रवेशियों में आत्मविश्वास विकसित किया जा सकता है। साथ ही, ऐसी शिकायत निवारण व्यवस्था होनी चाहिए, जहाँ विद्यार्थी बिना किसी भय या संकोच के अपनी समस्या साझा कर सकें।रैगिंग की रोकथाम केवल प्रशासन या किसी एक समिति की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें कुलपति, कुलसचिव, संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, छात्र कल्याण अधिष्ठाता, अभिभावक और विद्यार्थी सभी की सहभागिता आवश्यक है। सभी को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।साइबर रैगिंग भी एक बड़ी चुनौती* – डिजिटल युग में रैगिंग का स्वरूप केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया और मैसेजिंग समूहों के माध्यम से किसी विद्यार्थी का उपहास करना, अपमानजनक सामग्री साझा करना या धमकी देना भी गंभीर समस्या है। इसलिए विद्यार्थियों को साइबर सुरक्षा, डिजिटल शिष्टाचार और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। ऐसी घटनाओं पर भी संस्थान को लागू नियमों और संबंधित कानूनों के अनुसार उचित कार्रवाई करनी चाहिए।मोनाड विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता* – मोनाड विश्वविद्यालय, हापुड़ में विद्यार्थियों की सुरक्षा, कल्याण और सर्वांगीण विकास के लिए सकारात्मक एवं सहयोगात्मक वातावरण का निर्माण महत्वपूर्ण है। एंटी-रैगिंग जागरूकता कार्यक्रमों, संवाद और अनुशासनात्मक व्यवस्थाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को रैगिंग के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया जा सकता है। छात्र कल्याण अधिष्ठाता के रूप में विद्यार्थियों की समस्याओं को संवेदनशीलता से सुनना, उचित मार्गदर्शन देना और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सकारात्मक वातावरण विकसित करना विशेष महत्व रखता है।निष्कर्ष रैगिंग मुक्त भारत का सपना तभी साकार होगा, जब प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान इसे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी मानेगा। प्रभावी नियमों और निगरानी के साथ-साथ विद्यार्थियों में सहानुभूति, अनुशासन, समानता और पारस्परिक सम्मान जैसे मानवीय मूल्यों का विकास आवश्यक है।वरिष्ठ विद्यार्थियों को नवप्रवेशियों का मार्गदर्शक बनना चाहिए और संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी विद्यार्थी की गरिमा एवं सुरक्षा से समझौता न हो। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि रैगिंग को परंपरा नहीं, बल्कि समाप्त की जाने वाली एक नकारात्मक प्रवृत्ति मानेंगे। सम्मान, सहयोग और सद्भाव पर आधारित शैक्षणिक वातावरण ही सशक्त युवा पीढ़ी तथा रैगिंग मुक्त भारत की मजबूत नींव बनेगा।

